सौर मंडल के बाहर ग्रह से पहली बार सीधे रेडियो सिग्नल का पता, एलियन जीवन की तलाश में अहम कदम
नई खोज से ब्रह्मांड में जीवन की संभावनाओं को समझने का रास्ता हुआ मजबूत, वैज्ञानिकों ने कहा- यह एलियंस का संदेश नहीं

नई दिल्ली। अंतरिक्ष विज्ञान की दुनिया में वैज्ञानिकों ने एक ऐसी खोज की है, जिसने सौर मंडल के बाहर मौजूद ग्रहों को समझने और वहां जीवन की संभावनाओं की तलाश के लिए एक नया रास्ता खोल दिया है। खगोलविदों ने पहली बार किसी एक्सोप्लैनेट यानी सौर मंडल के बाहर स्थित ग्रह से सीधे आने वाले रेडियो उत्सर्जन का पता लगाया है। यह रेडियो संकेत बीटा पिक्टोरिस बी (β Pictoris b) नामक विशाल गैसीय ग्रह से जुड़ा पाया गया है।
इस खोज को सेंटर फॉर एस्ट्रोफिजिक्स | हार्वर्ड एंड स्मिथसोनियन और यूनिवर्सिटी ऑफ ओरेगन के वैज्ञानिकों की टीम ने किया है। वैज्ञानिकों ने दक्षिण अफ्रीका में स्थित MeerKAT रेडियो टेलीस्कोप एरे की मदद से इस ग्रह से आने वाले रेडियो उत्सर्जन का अध्ययन किया। शोधकर्ताओं के अनुसार इससे पहले भी ग्रहों वाले दूसरे तारकीय सिस्टम से रेडियो संकेत देखे गए थे, लेकिन उन संकेतों को सीधे ग्रह से जोड़ना संभव नहीं था। यह स्पष्ट नहीं हो पाता था कि रेडियो उत्सर्जन ग्रह से आ रहा है या उस ग्रह की परिक्रमा करने वाले तारे से। नई खोज में वैज्ञानिकों ने संकेत को सीधे ग्रह के स्थान से जोड़ने में सफलता हासिल की है।
करीब 63 प्रकाश वर्ष दूर है ग्रह
बीटा पिक्टोरिस बी पृथ्वी से लगभग 63 प्रकाश वर्ष दूर स्थित एक विशाल गैसीय एक्सोप्लैनेट है। यह बीटा पिक्टोरिस नाम के युवा तारे की परिक्रमा करता है। वैज्ञानिकों के लिए यह सिस्टम लंबे समय से अध्ययन का विषय रहा है, क्योंकि यह अपेक्षाकृत नजदीक है और इसका ग्रह अपने तारे से काफी दूर स्थित है, जिससे उसकी गतिविधियों का अध्ययन करना आसान होता है।
शोधकर्ताओं ने 2025 और 2026 के दौरान कई अवलोकनों में रेडियो उत्सर्जन को रिकॉर्ड किया। इन संकेतों में तेज, दोहराए जाने वाले और अत्यधिक गोलाकार ध्रुवीकृत रेडियो बर्स्ट देखे गए। संकेत लगभग 0.85 से 3.5 गीगाहर्ट्ज की आवृत्तियों पर दर्ज किए गए। इन विशेषताओं ने वैज्ञानिकों को यह समझने में मदद की कि रेडियो उत्सर्जन किसी सामान्य तारकीय रेडियो स्रोत के बजाय ग्रह से संबंधित हो सकता है।
कैसे पता चला कि सिग्नल ग्रह से आया?
वैज्ञानिकों के सामने सबसे बड़ी चुनौती यही थी कि रेडियो सिग्नल को ग्रह और उसके तारे के बीच सही स्थान पर पहचाना जाए। चूंकि एक्सोप्लैनेट पृथ्वी से बेहद दूर होते हैं, इसलिए उनके आसपास के रेडियो स्रोतों को अलग-अलग पहचानना बेहद कठिन होता है।
शोधकर्ताओं ने रेडियो आकाश में अन्य दूरस्थ स्रोतों को संदर्भ बिंदु के रूप में इस्तेमाल करते हुए सिग्नल की स्थिति निर्धारित की। कई अवलोकनों के बाद रेडियो उत्सर्जन को बीटा पिक्टोरिस बी के स्थान से जोड़ा गया। यही इस अध्ययन की सबसे महत्वपूर्ण उपलब्धि मानी जा रही है, क्योंकि इससे पहले एक्सोप्लैनेट से आने वाले रेडियो उत्सर्जन की इतनी स्पष्ट पहचान नहीं हुई थी।
एलियंस का संदेश नहीं है रेडियो सिग्नल
इस खोज को लेकर सोशल मीडिया और आम लोगों के बीच सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या वैज्ञानिकों को एलियन सभ्यता का संदेश मिला है? वैज्ञानिकों के अनुसार ऐसा नहीं है।
शोधकर्ताओं ने रेडियो संकेत की प्रकृति का अध्ययन करने के बाद इसे ग्रह के ऑरोरा यानी ध्रुवीय प्रकाश से जुड़ी प्राकृतिक प्रक्रिया माना है। इसके पीछे ग्रह के चुंबकीय क्षेत्र और उसके आसपास मौजूद आवेशित कणों की गतिविधि महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। इस प्रक्रिया को electron cyclotron maser emission कहा जाता है। इसी तरह की रेडियो प्रक्रिया हमारे सौर मंडल के कुछ ग्रहों, विशेषकर बृहस्पति, से जुड़े ऑरोरा में भी देखी जाती है।
इसलिए इस खोज को एलियन जीवन का प्रत्यक्ष प्रमाण कहना वैज्ञानिक रूप से सही नहीं होगा। हालांकि यह खोज ग्रहों के चुंबकीय क्षेत्र और उनके वातावरण को समझने के लिए बेहद महत्वपूर्ण हो सकती है।
ग्रह के चुंबकीय क्षेत्र के बारे में मिली अहम जानकारी
वैज्ञानिकों के लिए इस खोज का एक बड़ा महत्व यह भी है कि रेडियो उत्सर्जन ग्रह के चुंबकीय क्षेत्र के बारे में जानकारी दे सकता है। शोधकर्ताओं ने रेडियो उत्सर्जन की विशेषताओं के आधार पर बीटा पिक्टोरिस बी के चुंबकीय क्षेत्र की ताकत के बारे में अनुमान लगाया है। अध्ययन में कम से कम लगभग 1.25 किलो-गॉस के चुंबकीय क्षेत्र का संकेत मिलता है। यह किसी एक्सोप्लैनेट के चुंबकीय क्षेत्र की प्रत्यक्ष रेडियो-आधारित माप की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है।
ग्रह का चुंबकीय क्षेत्र वैज्ञानिकों के लिए इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह ग्रह और उसके वातावरण को उसके तारे से आने वाले आवेशित कणों और तारकीय हवा के प्रभाव से बचाने में भूमिका निभा सकता है। पृथ्वी का चुंबकीय क्षेत्र भी सौर हवा से संबंधित कई प्रभावों से हमारी रक्षा करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
क्या इससे दूसरे ग्रहों पर जीवन की तलाश में मदद मिलेगी?
वैज्ञानिक लंबे समय से यह पता लगाने की कोशिश कर रहे हैं कि पृथ्वी के अलावा ब्रह्मांड में कहीं जीवन मौजूद है या नहीं। इसके लिए वैज्ञानिक एक्सोप्लैनेट के वातावरण, तापमान, रासायनिक संरचना, पानी की संभावित मौजूदगी और चुंबकीय क्षेत्र जैसे कई संकेतों का अध्ययन करते हैं।
रेडियो खगोल विज्ञान इस खोज में एक और महत्वपूर्ण उपकरण बन सकता है। यदि वैज्ञानिक अलग-अलग एक्सोप्लैनेट से निकलने वाले रेडियो उत्सर्जन को पहचान सकें तो उन्हें उन ग्रहों के चुंबकीय क्षेत्र, तारकीय हवा के साथ उनकी परस्पर क्रिया और वातावरण के बारे में अधिक जानकारी मिल सकती है।
हालांकि केवल रेडियो सिग्नल मिलने का मतलब यह नहीं है कि उस ग्रह पर जीवन मौजूद है। जीवन की मौजूदगी का पता लगाने के लिए कई स्वतंत्र वैज्ञानिक प्रमाणों की आवश्यकता होगी।
ब्रह्मांड में हम अकेले हैं या नहीं?
पृथ्वी के बाहर जीवन की तलाश मानव विज्ञान के सबसे बड़े सवालों में से एक है। अब तक पृथ्वी के बाहर किसी जीवन का प्रत्यक्ष और पुष्ट प्रमाण नहीं मिला है। वैज्ञानिकों ने हजारों एक्सोप्लैनेट खोजे हैं और इनमें से कुछ ऐसे भी हैं जिनकी परिस्थितियां वैज्ञानिकों को विशेष रूप से आकर्षित करती हैं। नासा के एक्सोप्लैनेट आर्काइव में सितंबर 2026 तक 6,366 पुष्ट एक्सोप्लैनेट दर्ज थे।
हालांकि इनमें से किसी ग्रह पर जीवन मिलने की पुष्टि अभी नहीं हुई है। इसलिए बीटा पिक्टोरिस बी से मिले रेडियो उत्सर्जन को जीवन की खोज के अंतिम प्रमाण के रूप में देखना जल्दबाजी होगी।
भविष्य के अध्ययन के लिए खुला नया रास्ता
वैज्ञानिकों के लिए यह खोज इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि अब एक्सोप्लैनेट के चुंबकीय क्षेत्र और रेडियो गतिविधियों का सीधे अध्ययन करने की संभावना मजबूत हुई है। भविष्य में अधिक शक्तिशाली रेडियो टेलीस्कोप और लंबे समय तक किए जाने वाले अवलोकन यह पता लगाने में मदद कर सकते हैं कि ऐसे रेडियो उत्सर्जन कितने सामान्य हैं और किन परिस्थितियों में ग्रहों पर मजबूत रेडियो संकेत पैदा होते हैं।
बीटा पिक्टोरिस बी से मिली यह पहली प्रत्यक्ष रेडियो पहचान एक्सोप्लैनेट विज्ञान में एक महत्वपूर्ण कदम है। यह खोज एलियन जीवन का प्रमाण नहीं देती, लेकिन यह वैज्ञानिकों को दूर स्थित ग्रहों की भौतिक परिस्थितियों को समझने के लिए एक नया माध्यम जरूर प्रदान करती है।
फिलहाल वैज्ञानिकों की नजर इस बात पर है कि भविष्य के रेडियो अवलोकनों से बीटा पिक्टोरिस बी और अन्य एक्सोप्लैनेट के चुंबकीय क्षेत्र, वातावरण और उनके तारों के साथ संबंधों के बारे में कितनी नई जानकारी सामने आती है।
JANPAD NEWS 24 UP
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वैज्ञानिक तथ्य: यह शोध 15 सितंबर 2026 को प्रीप्रिंट के रूप में प्रकाशित हुआ है और अभी इसकी विशेषज्ञ समीक्षा (peer review) पूरी नहीं हुई है। इसलिए निष्कर्षों को आगे के स्वतंत्र अवलोकनों और समीक्षा के साथ देखना उचित होगा।