सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: बिहार में वोटर लिस्ट SIR प्रक्रिया को मिली संवैधानिक मंजूरी।

सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: बिहार में वोटर लिस्ट SIR प्रक्रिया को मिली संवैधानिक मंजूरी।

चुनाव आयोग के अधिकारों पर मुहर, फर्जी और डुप्लीकेट मतदाताओं पर बड़ी कार्रवाई को वैध ठहराया।

देश की राजनीति और चुनावी व्यवस्था से जुड़ा एक बड़ा फैसला सामने आया है। सुप्रीम कोर्ट ने बिहार में विधानसभा चुनाव से पहले कराए गए मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी Special Intensive Revision (SIR) को वैध और संवैधानिक करार देते हुए चुनाव आयोग के अधिकारों को मंजूरी दे दी है। अदालत के इस फैसले को चुनावी पारदर्शिता और मतदाता सूची की शुद्धता सुनिश्चित करने की दिशा में बेहद अहम माना जा रहा है।

मुख्य न्यायाधीश की अगुवाई वाली पीठ ने स्पष्ट कहा कि चुनाव आयोग एक संवैधानिक संस्था है और उसे स्वतंत्र एवं निष्पक्ष चुनाव सुनिश्चित करने के लिए विशेष प्रक्रियाएं अपनाने का पूरा अधिकार है। अदालत ने यह भी माना कि विशेष परिस्थितियों में मतदाता सूची की अलग प्रक्रिया अपनाना संविधान या कानून के खिलाफ नहीं है।

क्या है SIR प्रक्रिया।

Special Intensive Revision यानी SIR एक विशेष मतदाता पुनरीक्षण प्रक्रिया है, जिसके तहत मतदाता सूची की गहन जांच की जाती है। इसका मुख्य उद्देश्य फर्जी वोटरों, मृत मतदाताओं, डुप्लीकेट नामों और स्थायी रूप से स्थानांतरित हो चुके लोगों के नाम हटाना तथा नए पात्र मतदाताओं को सूची में शामिल करना होता है।

बिहार में यह प्रक्रिया वर्ष 2025 में शुरू की गई थी। इससे पहले वर्ष 2003 में इस तरह का विशेष पुनरीक्षण किया गया था। चुनाव आयोग का कहना था कि वर्षों से मतदाता सूची में बड़ी संख्या में ऐसे नाम शामिल थे, जो या तो मृत हो चुके थे, दूसरे राज्यों में चले गए थे या जिनके नाम दो-दो जगह दर्ज थे।

सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा।

सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि चुनाव आयोग को मतदाता सूची की शुद्धता बनाए रखने का संवैधानिक दायित्व मिला हुआ है। यदि आयोग को यह लगता है कि विशेष परिस्थिति में व्यापक पुनरीक्षण की जरूरत है, तो वह ऐसी प्रक्रिया लागू कर सकता है।

अदालत ने याचिकाकर्ताओं की उस दलील को खारिज कर दिया जिसमें कहा गया था कि SIR सामान्य संशोधन प्रक्रिया से अलग है और इससे मतदाताओं के अधिकार प्रभावित हो सकते हैं। कोर्ट ने कहा कि यदि प्रक्रिया पारदर्शी और कानून के दायरे में हो, तो इसे असंवैधानिक नहीं कहा जा सकता।

बिहार में क्यों शुरू हुई थी SIR प्रक्रिया।

बिहार में विधानसभा चुनाव से पहले चुनाव आयोग को मतदाता सूची में भारी गड़बड़ियों की शिकायतें मिली थीं। इसके बाद 24 जून 2025 को राज्यभर में विशेष गहन पुनरीक्षण अभियान शुरू किया गया।

पहले चरण में आयोग ने 99.8 प्रतिशत कवरेज के साथ लगभग 7.24 करोड़ मतदाताओं से फॉर्म प्राप्त किए। जांच में सामने आया कि बड़ी संख्या में मतदाता या तो मृत हो चुके थे, कई लोग अपने घरों पर नहीं मिले और लाखों लोग स्थायी रूप से दूसरी जगह शिफ्ट हो चुके थे।

आयोग के आंकड़ों के अनुसार:।

लगभग 22 लाख मतदाता मृत पाए गए।

करीब 36 लाख लोग अपने पते पर नहीं मिले।

लगभग 7 लाख लोग दूसरी जगह स्थायी निवासी बन चुके थे।

लाखों नाम डुप्लीकेट पाए गए।

इन आंकड़ों ने चुनाव आयोग की चिंताओं को सही साबित किया।

वोटर लिस्ट में बड़े बदलाव।

SIR प्रक्रिया के बाद बिहार की मतदाता सूची में बड़े बदलाव देखने को मिले। चुनाव आयोग द्वारा जारी आंकड़ों के अनुसार इस प्रक्रिया के बाद राज्य में कुल वोटरों की संख्या लगभग 6 प्रतिशत तक घट गई।

पहले जहां बिहार में लगभग 7.89 करोड़ मतदाता थे, वहीं पुनरीक्षण के बाद यह संख्या घटकर करीब 7.42 करोड़ रह गई।

इस दौरान:

लगभग 69.29 लाख नाम सूची से हटाए गए।

करीब 21.53 लाख नए मतदाताओं को जोड़ा गया।

ड्राफ्ट सूची से हटाए गए 17 लाख नामों को आपत्तियों के बाद दोबारा शामिल किया गया।

नई अंतिम सूची के अनुसार:।

22.34 लाख मतदाता मृत पाए गए।

6.85 लाख लोगों के नाम दो जगह दर्ज थे।

36.44 लाख लोग स्थायी रूप से दूसरी जगह स्थानांतरित हो चुके थे।

जिलों में भी दिखा बड़ा असर।

SIR प्रक्रिया का असर बिहार के कई जिलों में स्पष्ट दिखाई दिया। राजधानी पटना में मतदाताओं की संख्या में वृद्धि दर्ज की गई। यहां लगभग 1 लाख 63 हजार 600 नए मतदाता जुड़े, जिसके बाद कुल मतदाता संख्या 48 लाख से अधिक हो गई।

वहीं सारण जिले में बड़ी संख्या में नाम हटाए गए। यहां लगभग 2 लाख 24 हजार 768 मतदाताओं के नाम सूची से हटे, जिसके बाद कुल मतदाता संख्या में भारी कमी दर्ज की गई।

राजनीतिक बहस भी तेज।

सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद राजनीतिक हलकों में बहस तेज हो गई है। विपक्षी दलों ने पहले इस प्रक्रिया पर सवाल उठाए थे और आरोप लगाया था कि इससे गरीब और प्रवासी मतदाताओं के अधिकार प्रभावित हो सकते हैं।

हालांकि चुनाव आयोग लगातार यह कहता रहा कि पूरी प्रक्रिया पारदर्शी तरीके से की गई और हर मतदाता को अपना पक्ष रखने का अवसर दिया गया। आयोग ने हटाए गए मतदाताओं की सूची और कारण भी सार्वजनिक किए थे।

अब सुप्रीम कोर्ट की मंजूरी मिलने के बाद चुनाव आयोग का पक्ष और मजबूत हो गया है।

चुनावी पारदर्शिता की दिशा में बड़ा कदम।

विशेषज्ञों का मानना है कि यह फैसला देश की चुनावी व्यवस्था के लिए बेहद महत्वपूर्ण साबित हो सकता है। लंबे समय से मतदाता सूचियों में फर्जी नाम, डुप्लीकेट एंट्री और मृत मतदाताओं के नाम बने रहने को लेकर सवाल उठते रहे हैं।

ऐसे में सुप्रीम कोर्ट द्वारा SIR प्रक्रिया को संवैधानिक ठहराना भविष्य में अन्य राज्यों के लिए भी मिसाल बन सकता है। इससे चुनाव आयोग को मतदाता सूची को और अधिक शुद्ध और पारदर्शी बनाने में मदद मिलेगी।

लोकतंत्र को मजबूत करने वाला फैसला।

लोकतंत्र की मजबूती निष्पक्ष चुनावों पर निर्भर करती है और निष्पक्ष चुनाव के लिए साफ-सुथरी मतदाता सूची बेहद जरूरी होती है। सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले ने साफ कर दिया है कि चुनाव आयोग को इस दिशा में जरूरी कदम उठाने का अधिकार है।

अब माना जा रहा है कि आने वाले समय में देश के अन्य राज्यों में भी इस तरह की विशेष पुनरीक्षण प्रक्रिया अपनाई जा सकती है, ताकि चुनावी व्यवस्था को और अधिक मजबूत और पारदर्शी बनाया जा सके।

JANPADNEWS24UP संपादक नवीन गोस्वामी।

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