पीओपी की नहीं, मिट्टी की मूर्ति अपनाएं—जल स्रोतों को प्रदूषण से बचाएं।

पीओपी की नहीं, मिट्टी की मूर्ति अपनाएं—जल स्रोतों को प्रदूषण से बचाएं।

संपादकीय | पुष्पा भाटी।

गणेशोत्सव में आस्था के साथ पर्यावरण संरक्षण का भी लें संकल्प।

गणेशोत्सव की तैयारियां शुरू होते ही घरों, बाजारों और पूजा पंडालों में भगवान गणेश की प्रतिमाओं को लेकर चर्चा तेज हो गई है। वर्ष 2026 में गणेश चतुर्थी का पर्व 14 सितंबर को मनाया जाएगा। इसी दिन से दस दिवसीय गणेशोत्सव की शुरुआत होगी और 25 सितंबर को अनंत चतुर्दशी के अवसर पर गणेश प्रतिमाओं के विसर्जन के साथ इस पर्व का समापन होगा। हालांकि अनेक श्रद्धालु अपनी पारिवारिक और स्थानीय परंपराओं के अनुसार डेढ़, तीन, पांच या सात दिन बाद भी गणेश प्रतिमा का विसर्जन करते हैं।

गणेशोत्सव हमारे लिए केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं है। यह आस्था, संस्कृति, परंपरा, सामाजिक एकता और सामूहिक सहभागिता का पर्व है। भगवान गणेश को विघ्नहर्ता और मंगलकारी देवता के रूप में पूजा जाता है। किसी भी शुभ कार्य की शुरुआत से पहले गणेश जी का स्मरण करने की परंपरा भारतीय समाज में लंबे समय से चली आ रही है। विवाह, गृह प्रवेश, व्यापार की शुरुआत और अन्य मांगलिक अवसरों पर गणेश पूजन आज भी अनेक परिवारों का अभिन्न हिस्सा है।

हमारी पारंपरिक धार्मिक और लोक परंपराओं में प्राकृतिक सामग्री से बनी गणेश प्रतिमाओं का भी विशेष स्थान रहा है। कई परिवारों में विवाह से पहले चिकनी या गीली मिट्टी से छोटी गणेश प्रतिमा तैयार कर उसकी पूजा की जाती रही है। संस्कार पूरा होने के बाद उस प्रतिमा को जल में प्रवाहित करने की परंपरा भी रही है। यह परंपरा हमें यह सोचने का अवसर देती है कि प्रकृति से प्राप्त सामग्री से बनी प्रतिमा और प्रकृति में वापस लौट जाने वाली सामग्री के बीच कितना स्वाभाविक संबंध है।

भव्यता की होड़ में कहीं प्रकृति न हो जाए नजरअंदाज।

समय के साथ गणेशोत्सव का स्वरूप भी बदला है। आज बाजारों में तरह-तरह की विशाल और आकर्षक प्रतिमाएं उपलब्ध हैं। प्रतिमाओं को सजाने के लिए रंगों, प्लास्टिक, थर्मोकोल और अन्य कृत्रिम सामग्रियों का इस्तेमाल भी बड़े स्तर पर होता है। श्रद्धालुओं की आस्था और उत्साह अपनी जगह है, लेकिन इसी के साथ यह सवाल भी महत्वपूर्ण हो जाता है कि धार्मिक उत्सव की भव्यता कहीं पर्यावरण के लिए परेशानी का कारण तो नहीं बन रही।

विशेष रूप से प्लास्टर ऑफ पेरिस (पीओपी) से बनी प्रतिमाओं को लेकर पर्यावरण संबंधी चिंताएं लंबे समय से सामने आती रही हैं। पीओपी पानी में मिट्टी की तरह आसानी से नहीं घुलता। प्रतिमा के साथ इस्तेमाल किए गए रासायनिक रंग, प्लास्टिक, सजावटी सामग्री और अन्य कृत्रिम पदार्थ भी जल स्रोतों तक पहुंच सकते हैं। नदी, तालाब, झील और अन्य जलाशयों में ऐसी सामग्री जमा होने से जल की गुणवत्ता प्रभावित हो सकती है।

सबसे गंभीर बात यह है कि इन जल स्रोतों का संबंध केवल इंसानों से नहीं है। इन्हीं जल स्रोतों पर अनेक जलीय जीवों और वनस्पतियों का जीवन निर्भर करता है। प्रदूषण का असर जल की पारिस्थितिकी पर पड़ सकता है। इसलिए भगवान गणेश की प्रतिमा का विसर्जन करते समय यह विचार करना जरूरी है कि हमारी धार्मिक आस्था के कारण प्रकृति को अनावश्यक नुकसान न पहुंचे।

मिट्टी की प्रतिमा से आस्था भी, रोजगार भी।

ऐसे समय में मिट्टी की गणेश प्रतिमाओं को बढ़ावा देना एक बेहतर विकल्प हो सकता है। प्राकृतिक मिट्टी से बनी प्रतिमाएं पारंपरिक शिल्प और स्थानीय कला से जुड़ी हुई हैं। यदि लोग मिट्टी की प्रतिमाओं को प्राथमिकता देंगे तो इसका सीधा लाभ स्थानीय मूर्तिकारों और कारीगरों को भी मिलेगा।

गणेशोत्सव के दौरान बड़ी संख्या में प्रतिमाओं की मांग होती है। यदि स्थानीय कारीगरों से मिट्टी की प्रतिमाएं खरीदी जाएं तो छोटे कारोबार को बढ़ावा मिलेगा। इससे पारंपरिक मूर्तिकला को भी संरक्षण मिलेगा और उन परिवारों की आय का साधन मजबूत हो सकता है जो पीढ़ियों से इस कला से जुड़े हुए हैं।

इस तरह मिट्टी की प्रतिमा अपनाने का अर्थ केवल पर्यावरण की चिंता करना नहीं है। यह स्थानीय अर्थव्यवस्था, पारंपरिक कला और कारीगरों के सम्मान से भी जुड़ा हुआ कदम है।

परंपरा के नाम पर प्रमाणहीन दावे नहीं, प्रकृति के अनुकूल आस्था जरूरी।

धार्मिक परंपराओं को लेकर किसी भी प्रकार का दावा करते समय सावधानी आवश्यक है। धर्मग्रंथों या धार्मिक परंपराओं के नाम पर ऐसी बात निश्चित रूप से नहीं कही जानी चाहिए जिसका प्रमाण उपलब्ध न हो। लेकिन यह तथ्य जरूर देखा जा सकता है कि प्राकृतिक मिट्टी से प्रतिमा बनाने की परंपरा भारतीय लोकजीवन और विभिन्न पारंपरिक धार्मिक संस्कारों में लंबे समय से दिखाई देती है।

इसलिए मुद्दा किसी धार्मिक परंपरा को सही या गलत साबित करने का नहीं है। असली सवाल यह है कि आज के समय में हम अपनी आस्था को प्रकृति के अनुकूल कैसे बना सकते हैं। धार्मिक उत्सव हमारी संस्कृति की ताकत हैं और पर्यावरण हमारी आने वाली पीढ़ियों की जरूरत। दोनों के बीच संतुलन बनाना समाज की सामूहिक जिम्मेदारी है।

प्रशासन की भी हो जिम्मेदारी।

पर्यावरण संरक्षण की जिम्मेदारी केवल श्रद्धालुओं की नहीं हो सकती। स्थानीय प्रशासन और नगर निकायों को भी गणेशोत्सव से पहले प्रभावी व्यवस्था करनी चाहिए। जल स्रोतों में पीओपी से बनी प्रतिमाओं और अन्य गैर-जैविक सामग्री के विसर्जन को रोकने के लिए पर्याप्त जागरूकता अभियान चलाया जाना चाहिए।

जहां आवश्यक हो, वहां कृत्रिम विसर्जन कुंड बनाए जाएं, ताकि श्रद्धालु धार्मिक परंपरा का पालन करते हुए प्राकृतिक जल स्रोतों को प्रदूषण से बचा सकें। पूजा सामग्री, फूल-माला, कपड़े और अन्य वस्तुओं के लिए अलग-अलग संग्रह की व्यवस्था भी की जानी चाहिए।

प्रशासन को केवल आदेश जारी करने तक सीमित नहीं रहना चाहिए। लोगों को यह भी समझाना होगा कि पर्यावरण संरक्षण किसी धर्म के खिलाफ नहीं है। बल्कि स्वच्छ जल, स्वच्छ हवा और सुरक्षित प्रकृति आने वाली पीढ़ियों के लिए सबसे बड़ी विरासत है।

आस्था के साथ जिम्मेदारी भी जरूरी।

भगवान गणेश से हम सुख, समृद्धि, बुद्धि, स्वास्थ्य और मंगल की कामना करते हैं। ऐसे में हमें यह भी सोचना चाहिए कि हमारी पूजा और उत्सव का स्वरूप प्रकृति के लिए कितना अनुकूल है। यदि गणेश जी को विघ्नहर्ता मानकर हम उनकी पूजा करते हैं तो हमें ऐसा कोई कार्य नहीं करना चाहिए जो जल, जमीन और जीव-जंतुओं के लिए नया संकट पैदा करे।

हमारी आस्था तभी अधिक सार्थक होगी जब उसके साथ जिम्मेदारी भी जुड़ी हो। पूजा के बाद प्रतिमा विसर्जन की परंपरा निभाते समय यह ध्यान रखना जरूरी है कि जिस जल को हम जीवन का आधार मानते हैं, उसे प्रदूषित न करें।

इस गणेशोत्सव एक छोटा संकल्प, बड़ा बदलाव।

इस बार गणेशोत्सव पर प्रत्येक परिवार एक छोटा लेकिन महत्वपूर्ण संकल्प ले सकता है—पीओपी की नहीं, मिट्टी की गणेश प्रतिमा अपनाएं। प्रतिमा खरीदते समय उसकी सामग्री के बारे में जानकारी लें। सजावट में प्लास्टिक और ऐसी सामग्री का इस्तेमाल कम करें जो बाद में कचरे का रूप लेकर पर्यावरण को नुकसान पहुंचाती है। विसर्जन के लिए प्रशासन द्वारा निर्धारित स्थानों और कृत्रिम विसर्जन कुंडों का ही इस्तेमाल करें।

गणेशोत्सव आस्था का पर्व है और आस्था हमें जोड़ती है। यदि इसी आस्था के साथ प्रकृति की रक्षा का संकल्प भी जुड़ जाए तो यह पर्व समाज के लिए और अधिक सार्थक बन सकता है।

भगवान गणेश से सुखी और समृद्ध जीवन की प्रार्थना करते समय हमें यह भी सुनिश्चित करना चाहिए कि हमारी आने वाली पीढ़ियों को स्वच्छ जल, स्वच्छ वातावरण और सुरक्षित प्रकृति मिल सके। सुखी जीवन की कामना करते हुए प्रकृति को बद्दुआ देना हमारी आस्था का उद्देश्य नहीं हो सकता।

आस्था का अर्थ केवल भगवान की पूजा करना नहीं, बल्कि भगवान की बनाई प्रकृति की रक्षा करना भी है। इसलिए इस गणेशोत्सव पर आइए, भव्यता की होड़ से ऊपर उठकर पर्यावरण की चिंता करें और मिट्टी की प्रतिमा को प्राथमिकता दें।

पीओपी की नहीं, मिट्टी की मूर्ति अपनाएं। जल स्रोतों को प्रदूषण से बचाएं। यही प्रकृति के प्रति जिम्मेदारी, समाज के प्रति संवेदनशीलता और भगवान गणेश के प्रति सच्ची श्रद्धा की पहचान होगी।

जनपद न्यूज़ 24 यूपी।

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