सुप्रीम कोर्ट का अहम फैसला: केवल वाहन का घटनाक्रम में शामिल होना मुआवजे के लिए पर्याप्त नहीं, मौत और वाहन के इस्तेमाल के बीच सीधा संबंध होना जरूरी
नई दिल्ली। मोटर वाहन अधिनियम के तहत मुआवजे से जुड़े मामलों में सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया है कि किसी व्यक्ति की मौत से जुड़ी घटनाओं की श्रृंखला में केवल मोटर वाहन का शामिल होना ही वाहन मालिक या बीमा कंपनी को मुआवजा देने के लिए जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता। शीर्ष अदालत ने कहा कि मुआवजा तभी दिया जा सकता है, जब यह स्पष्ट रूप से साबित हो कि मौत सीधे तौर पर वाहन के इस्तेमाल के कारण हुई है और दोनों के बीच स्पष्ट एवं प्रत्यक्ष संबंध मौजूद है।

जस्टिस संजय करोल और जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की पीठ ने यह फैसला सुनाते हुए छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट और मोटर एक्सीडेंट क्लेम्स ट्रिब्यूनल (एमएसीटी) के उन आदेशों को रद्द कर दिया, जिनमें वाहन मालिक को मृतक की पत्नी को मुआवजा देने के लिए जिम्मेदार ठहराया गया था।
यह मामला वर्ष 2009 का है। रिकॉर्ड के अनुसार, 29 नवंबर 2009 को मृतक अपने मित्र दिलीप की कार में बैठकर गया था। इसके तीन दिन बाद, 2 दिसंबर 2009 को उसका शव एक गांव के पास बरामद हुआ। इसके बाद मृतक की पत्नी ने एफआईआर दर्ज कराई, जिसमें वाहन मालिक सहित अन्य लोगों पर अपहरण, हत्या और आपराधिक साजिश रचने का आरोप लगाया गया।
मामले की सुनवाई के दौरान ट्रायल कोर्ट ने वाहन मालिक को दोषी करार दिया था, लेकिन बाद में वर्ष 2015 में छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने उसे बरी कर दिया। हाई कोर्ट ने कहा कि अभियोजन पक्ष यह साबित करने में विफल रहा कि मृतक आखिरी बार आरोपियों के साथ ही देखा गया था। यानी तथाकथित “लास्ट सीन थ्योरी” को पर्याप्त साक्ष्यों के साथ सिद्ध नहीं किया जा सका।
आपराधिक मामले से अलग मृतक की पत्नी और बच्चों ने मोटर वाहन अधिनियम की धारा 165 और 166 के तहत मोटर एक्सीडेंट क्लेम्स ट्रिब्यूनल में मुआवजे की याचिका दाखिल की। उनका दावा था कि मृतक की हत्या वाहन के अंदर की गई थी, इसलिए वाहन मालिक और बीमा कंपनी मुआवजा देने के लिए जिम्मेदार हैं।
ट्रिब्यूनल ने इस दलील को स्वीकार करते हुए 5.64 लाख रुपये से अधिक का मुआवजा देने का आदेश दिया। बाद में छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने इस आदेश को बरकरार रखा और मुआवजे की राशि बढ़ाकर लगभग 8.60 लाख रुपये कर दी।
इसके बाद वाहन मालिक ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया और निचली अदालतों के फैसलों को चुनौती दी।
सुप्रीम कोर्ट ने पूरे मामले की विस्तार से समीक्षा करते हुए कहा कि मोटर वाहन अधिनियम के तहत मुआवजा तभी दिया जा सकता है, जब यह साबित हो कि मौत वाहन के उपयोग से सीधे तौर पर जुड़ी हुई है।
पीठ ने कहा कि केवल यह तथ्य कि मृतक किसी समय वाहन में बैठा था या घटनाक्रम में वाहन का नाम आया है, अपने आप में पर्याप्त नहीं माना जा सकता। अदालत ने स्पष्ट किया कि वाहन के इस्तेमाल और मौत के बीच प्रत्यक्ष, स्पष्ट और कानूनी रूप से स्थापित संबंध होना आवश्यक है।
अदालत ने अपने फैसले में यह भी टिप्पणी की कि निचली अदालतों ने यह मान लिया कि मृतक को लगी चोटें कार में ही लगी थीं, जबकि रिकॉर्ड पर ऐसा कोई ठोस और विश्वसनीय साक्ष्य उपलब्ध नहीं था जो इस निष्कर्ष का समर्थन करता हो।
पीठ ने कहा कि यह स्पष्ट नहीं है कि ट्रिब्यूनल और हाई कोर्ट इस निष्कर्ष पर कैसे पहुंचे कि चोटें कार के अंदर लगी थीं। ऐसे में केवल अनुमान के आधार पर मोटर वाहन अधिनियम के तहत मुआवजे की जिम्मेदारी तय नहीं की जा सकती।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि ट्रिब्यूनल और हाई कोर्ट वाहन और मौत के बीच आवश्यक कानूनी संबंध स्थापित करने में असफल रहे। इसलिए दोनों अदालतों के आदेश कानून की कसौटी पर टिक नहीं पाए। शीर्ष अदालत ने वाहन मालिक की अपील स्वीकार करते हुए निचली अदालतों के फैसलों को रद्द कर दिया।
कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार, यह निर्णय भविष्य में मोटर वाहन अधिनियम के तहत दायर होने वाले दावों के लिए महत्वपूर्ण मिसाल साबित हो सकता है। इस फैसले से स्पष्ट हो गया है कि हर उस मामले में, जिसमें किसी वाहन का नाम सामने आता है, वाहन मालिक या बीमा कंपनी को स्वतः मुआवजा देने के लिए जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता।
अब ऐसे मामलों में दावा करने वाले पक्ष को यह भी साबित करना होगा कि दुर्घटना या मौत वास्तव में वाहन के उपयोग का प्रत्यक्ष परिणाम थी। यदि वाहन और घटना के बीच स्पष्ट संबंध स्थापित नहीं होता, तो मोटर वाहन अधिनियम के तहत मुआवजे का दावा स्वीकार नहीं किया जा सकेगा।

सुप्रीम कोर्ट के इस निर्णय को मोटर दुर्घटना दावा मामलों में एक महत्वपूर्ण कानूनी व्याख्या माना जा रहा है, जो भविष्य में न्यायालयों और ट्रिब्यूनलों के लिए मार्गदर्शक सिद्धांत का काम करेगा। साथ ही, यह फैसला इस बात पर भी जोर देता है कि मुआवजा तय करते समय केवल परिस्थितियों के आधार पर नहीं, बल्कि ठोस साक्ष्यों और कानून में निर्धारित मानकों के आधार पर ही जिम्मेदारी तय की जानी चाहिए।
