300 साल पुरानी ऐतिहासिक बावड़ी का हुआ पुनर्जन्म, कचरे के ढेर से निकली विरासत; फिर फूटा मीठे पानी का प्राकृतिक स्रोत।

300 साल पुरानी ऐतिहासिक बावड़ी का हुआ पुनर्जन्म, कचरे के ढेर से निकली विरासत; फिर फूटा मीठे पानी का प्राकृतिक स्रोत।

बेलगावी (कर्नाटक)। कर्नाटक के बेलगावी जिले के मुतगा गांव में स्थित लगभग 300 वर्ष पुरानी ऐतिहासिक बावड़ी का सफलतापूर्वक पुनरुद्धार किया गया है। वर्षों तक कचरे, मलबे और उपेक्षा की शिकार रही यह प्राचीन जल संरचना अब फिर से अपनी पुरानी पहचान हासिल कर रही है। इस ऐतिहासिक अभियान को स्थानीय लोगों, स्वयंसेवकों और सामाजिक संगठनों के सामूहिक प्रयास का उत्कृष्ट उदाहरण माना जा रहा है।

जानकारी के अनुसार, आदिलशाही काल में निर्मित मानी जाने वाली इस बावड़ी को लंबे समय से साफ-सफाई और संरक्षण नहीं मिलने के कारण यह पूरी तरह कचरे से भर गई थी। हालत यह थी कि इसकी ऐतिहासिक भव्यता और वास्तविक स्वरूप लगभग पूरी तरह छिप चुका था। लेकिन जब इसके संरक्षण का अभियान शुरू हुआ तो धीरे-धीरे वर्षों से जमा मलबा और कचरा हटाया गया, जिसके बाद इस ऐतिहासिक धरोहर की वास्तविक सुंदरता एक बार फिर सामने आई।

सामूहिक प्रयास से मिली नई जिंदगी।

इस पुनरुद्धार अभियान में प्यास फाउंडेशन, राष्ट्रीय सेवा योजना (NSS) के स्वयंसेवकों और मुतगा गांव के ग्रामीणों ने मिलकर महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। कई दिनों तक चले सफाई अभियान में बड़ी मात्रा में प्लास्टिक, मिट्टी, पत्थर और अन्य प्रकार का कचरा निकाला गया।

स्वयंसेवकों ने न केवल बावड़ी की सफाई की, बल्कि उसके आसपास के क्षेत्र को भी व्यवस्थित किया, ताकि भविष्य में वहां दोबारा गंदगी न फैले। स्थानीय लोगों ने भी श्रमदान कर इस अभियान को सफल बनाने में पूरा सहयोग दिया। यही सामूहिक भागीदारी इस पुनरुद्धार की सबसे बड़ी ताकत बनकर सामने आई।

वर्षों बाद फिर दिखाई दिया मीठे पानी का प्राकृतिक स्रोत।

सफाई अभियान का सबसे सुखद परिणाम तब देखने को मिला जब वर्षों से दबे हुए प्राकृतिक मीठे पानी के स्रोत दोबारा सक्रिय हो गए। जैसे-जैसे कचरा हटता गया, बावड़ी के भीतर से साफ और मीठा पानी निकलने लगा।

इस घटना ने एक बार फिर यह साबित कर दिया कि भारत की पारंपरिक जल संरक्षण प्रणालियां कितनी वैज्ञानिक और प्रभावी थीं। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि ऐसी ऐतिहासिक जल संरचनाओं का समय-समय पर संरक्षण किया जाए, तो वे आज भी जल संकट से निपटने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं।

80 फीट गहरी, 53 पत्थर की सीढ़ियों वाली अनोखी बावड़ी।

यह बावड़ी लगभग 80 फीट गहरी बताई जाती है और इसमें नीचे तक जाने के लिए 53 पत्थर की सीढ़ियां बनाई गई हैं। इन सीढ़ियों की वास्तुकला उस समय के उत्कृष्ट निर्माण कौशल का परिचय देती है।

बावड़ी की सबसे अनोखी विशेषता इसका आकार है। स्थानीय लोगों के अनुसार, यदि इसे ऊपर से देखा जाए तो इसका स्वरूप भगवान शिव के शिवलिंग जैसा दिखाई देता है। यही कारण है कि यह केवल जल संरक्षण का साधन ही नहीं, बल्कि धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व की धरोहर भी मानी जाती है।

आदिलशाही काल की वास्तुकला का बेहतरीन उदाहरण।

इतिहासकारों के अनुसार यह बावड़ी संभवतः आदिलशाही शासनकाल में बनाई गई थी। उस समय जल संरक्षण के लिए कुएं, तालाब और बावड़ियों का व्यापक निर्माण कराया जाता था। इन संरचनाओं का उद्देश्य वर्षा जल का संग्रह करना और पूरे वर्ष लोगों को पेयजल उपलब्ध कराना था।

यह बावड़ी भी उसी परंपरा का एक उत्कृष्ट उदाहरण मानी जाती है। इसकी मजबूत पत्थर की दीवारें, सीढ़ीनुमा संरचना और प्राकृतिक जल स्रोत इसे ऐतिहासिक दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण बनाते हैं।

विरासत संरक्षण और जल संरक्षण का प्रेरक उदाहरण।

विशेषज्ञों का कहना है कि मुतगा गांव की यह पहल पूरे देश के लिए प्रेरणा बन सकती है। भारत में हजारों प्राचीन बावड़ियां, कुएं और जलाशय आज भी उपेक्षा के कारण नष्ट होने की कगार पर हैं। यदि स्थानीय समुदाय, सामाजिक संस्थाएं और प्रशासन मिलकर इसी तरह अभियान चलाएं तो इन ऐतिहासिक धरोहरों को दोबारा जीवंत किया जा सकता है।

इस पुनरुद्धार ने यह भी दिखाया है कि विरासत संरक्षण और पर्यावरण संरक्षण एक-दूसरे के पूरक हैं। एक ओर जहां ऐतिहासिक धरोहर सुरक्षित हुई, वहीं दूसरी ओर जल संरक्षण की एक प्रभावी व्यवस्था भी फिर से सक्रिय हो गई।

भविष्य के लिए महत्वपूर्ण संदेश।

मुतगा गांव की इस ऐतिहासिक बावड़ी का पुनरुद्धार केवल एक सफाई अभियान नहीं, बल्कि यह संदेश भी है कि यदि समाज अपनी सांस्कृतिक विरासत और प्राकृतिक संसाधनों के प्रति जागरूक हो जाए, तो वर्षों से उपेक्षित धरोहरों को भी नया जीवन दिया जा सकता है।

आज जब देश के कई हिस्से जल संकट का सामना कर रहे हैं, ऐसे समय में पारंपरिक जल संरचनाओं का संरक्षण अत्यंत आवश्यक हो गया है। बेलगावी की यह 300 साल पुरानी बावड़ी इस बात का जीवंत उदाहरण है कि हमारी पुरानी जल संरक्षण प्रणालियां आज भी प्रासंगिक हैं और भविष्य की जल सुरक्षा में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं।

JANPADNEWS24UP संपादक नवीन गोस्वामी।

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